जन्म, भ्रम-माया, नियति और नाड़ी-ज्योतिष व्याख्या

राहु पूर्व जन्मों में कर्मों के आंशिक कर्म ले कर इस जन्म में जीव के साथ अवतरित हुआ है। इस लिए इसे पूर्ण परमात्मा अंश माना गया है। जीव के कर्म समाप्त होने पर, यह राहु, जीव (गुरु ग्रह) की यात्रा को समाप्त करता है। यह राहु, मृत्यु वाला काल भी है।
इस लिए जिस भाव में जन्म के समय होता है वह नियति का प्रवेश द्वार होता है, वह द्वार कैसा है वहां पर उपलब्ध राशि, अंश, ग्रह आदि पर कर्म यात्रा का निर्धारण नियति करती है। परन्तु यह प्रवेश चुनाव राहु की पसंद अनुसार होता है। राहु के पास पुराने संबंध और उनको कर्म बंधन कि कुंजी होती है।
नियति का प्रमुख अंग है, काल-शनि (समय, संचित कर्मों का संग्रह करता) वो सारे कर्म क्रम अनुसार जीव को भुगतने के लिए उपलब्ध कराता है। राहु का दूसरा छोर केतु है, यानि कि कर्मों को निगल जाने के लिए राहु, और कर्मों को संपूर्ण भुगत कर समाप्त करने के लिए केतु है, जब ही इसे कर्मों से मुक्ति / मोक्ष का प्रतिक कहा गया है। चंद्रमा प्रत्येक कर्म का साक्षी बना रहता है। जीव यहाँ पर माया प्रभावित होने के कारण भ्रम में अनेक भाव से प्रभावित होता है जो कि कर्म भोग कहलाते हैं साथ में ये भाव में से कुछ, कर्म नये भी बन जाते हैं। जीव यहाँ अवचेतन है यानी कि अपने को नहीं जानता, यह चेतना ही जीव को ईश्वर बना सकती है यदि भ्रम, माया से प्रभाव समाप्त हो जाये। ईश्वर सूर्य है, माया को ईश्वर ने प्रकट किया होता है, ईश्वर माया के अधीन नहीं होता है। परन्तु माया को प्रकट करना भी इच्छा है जो ईश्वर को परमात्मा से अलग अलग होने का कारण बनाती है।
ज्योतिषी गण अनेकों बार ध्यान से पढ़ें, आप को अनेक समाधान मिलेंगे।
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कर्म व कर्मभाव भेद
ईश्वर कृत माया के तीन गुण और जीव के पशु, दिव्य एवं वीर भाव — वीर भाव ही मोक्ष का कारक है।

ज्ञान और जीव-शरीर
भौतिक शरीर और जीव-शरीर के अंतर को समझना कठिन है, पर आवश्यक है — माया से हटकर जो ज्ञान अभ्यास से आता है, वही शास्त्रों का ज्ञान है।